Sunday, November 17, 2019

पेबल क्रिक में प्रवेश की पूर्वपीठिका : अनुभव एवं कार्यारंभ  


 आज जब हैदराबाद स्थित 'पेबल क्रिक लाईफ स्कुल' में अपने 'प्रवेश' के बारे में मै सोचता हूँ तब यहाँ आने की पूर्वपीठिका याद आती है. सही मानो तो उन दिनों मैं एक अज्ञातवासी का जीवन जी रहा था. कथित रिश्तेदार सोशल मीडिया की मेरी अन्उपस्थिति पर सवाल-ऐ-निशान उठा रहे थे. हाल तो यह था की, गलती से किसी का फोन भी आ गया तो वह उठाना मेरे लिए घोर दुष्कर्म सा हो गया था. अर्थात, वह दुष्कर्म भी एक स्वयं घोषित इतिकर्तव्य की भाति मै निभाता रहता और गलती से कभी फोन की हरी बटन दब गई तो लंबे समय से फोन ना उठाने के लिए यार-दोस्तों की गालिया खाता. सही मानो तो कम से कम कुछ दिनों तक स्वांतसुखाय जीवन मै व्यतीत करना चाहता था. अर्थात, हमारे महान देश के किसी 'प्रधानसेवक' की तरह झोला लेके हिमालय जाने का मेरा कोई इरादा नहीं था. लेकिन उम्र के उस साल में कथित 'फ्यूचर' के बारे में मैं सोचने लगा था और उस वक्त के मेरे आज का कथित सामाजिक जीवन मानो अर्धविरामित हो गया.

      इन सभी क्रियाकलापों का एक कारण यह भी हो सकता है की, सुप्रसिद्ध 'टाटा सामजिक विज्ञानं संस्था' से 'बेस्ट स्टूडेंट अवोर्ड' पाकर मेरी सोशल वर्क की डिग्री ख़तम करने वाला मैं, ढेर सारी नोकारियों की उपलब्धता के बावजूद भी सिर्फ शांति, समय और थोडा - बहुत सन्मानजनक जीवन यापन करने लायक कम 'सैलरी' अदि लाभों से लाभान्वित होने के चक्कर में मै एक स्कुल में आ पहुचां था. अर्थात यह मेरा निजी 'डिसीजन' था. भला इस देश में स्कुल की नोकरी कोन करना चाहता है आज कल ? जब हम छोटे बच्चे थे तब गाव में पाठशाला में काम करने वाले सभी शिक्षक तथा कर्मचारी नि:संशय सारे गाव के आदर के पात्र हुवा करते थे. एक आदर्श जीवन उनका मना जाता था. लेकिन जैसे जैसे हम शादी की उम्र में आ पहुचे तब तक यह कथित आदर्श जीवन बेकार की नोकरी में बदल चुका था. शादी के मार्केट में इस और इस जैसे 'प्रोफेशन' की कोई जादा इज्जत थी नहीं. नहीं है. आप किसी कंपनी में आठ-दस हजार की नोकरी कर सकते हो. लेकिन आप अगर स्कुल में हो तो आप आपके दोस्तों की हसी का पात्र हो सकते हों. आपके रिश्तेदार भी आपको गलती से कभी मिल जाए तो जादा भाव नहीं देंगे. हो सकता है उनके लिए भी आप काम की चीज ना हो.


      खैर, महाविद्यालय और उसके पहले के कुछ सालो तक मैं और मेरे कुछ मित्रों को देश में देश में कथित क्रांति लानी थी. उस समय मुझे और मेरे दोस्तों को सही में लगता था की, आनेवाले तीन या चार महीनो में क्रांति आने वाली है, जैसे की वो कही बाहर घुमने गई हो. लेकिन बाद में हमें रोजगार के सवाल ने घेर लिया और क्रांति का हमारा सपना मानो कही भंग हो गया. खैर, जिस क्रांति के बारे हम लोक सोच रहे थे वह उस वक्त भी बन्दूको वाली न थी. आज यह कम से कम एक बड़ी बात तो निश्चित हो सकती है. हमेशा से हमें लगता था की क्रांति के लिए ढेर सारे वाचन, लेखन, चिंतन की जरुरत है. और स्कुल वाली नौकरी स्वीकार करने का यह भी एक सुप्त कारण हो सकता था.

      'टाटा इंस्टीट्यूट' में पढ़ते पढ़ते और वार्षिक परीक्षा के पहले 'पेबल क्रिक' की इस नौकरी के लिए मेरा 'सिलेक्शन' हो चुका था. इसके बाद मैंने कही अप्लाय करने का प्रयास न किया. और उसकी कभी कोई जरुरत भी महसूस न की. खैर, मेरे बहोत से दोस्त मुझसे जादा कमाते थे. और उनके बार बार किसी और जगह 'अप्लाय' करने के मुफ्त सलाह को मै नहीं मान रहा था. आज जब मै पीछे मुड कर देखता हू तो लगता है की वह मेरा एकदम सही फैसला था. अब आगे.

पेबल क्रिक में प्रवेश की पूर्वपीठिका : अनुभव एवं कार्यारंभ     आज जब हैदराबाद स्थित 'पेबल क्रिक लाईफ स्कुल' में अपने '...